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Tuesday, January 7, 2020

द्रोपदी गंगा स्नान कर रही थी।


द्रोपदी गंगा स्नान कर रही थी।

द्रोपदी गंगा स्नान कर रही थी। दृृष्टि दौड़ाई तो देखा कि कुछ दूर पर एक साधू स्नान कर रहा है। हवा से उसकी किनारे पर रखी लंगोटी पानी में बह गई और जिसे वह पहने था, पुरानी होने के कारण संयोगवश वह भी उसी समय फट गयी। बेचारा असमंजस में था। नंगी-उघारी स्थिति में लोगों के बीच से कैसे गुजरे? उसने दिन भर झाड़ी में छिपकर समय काटने कौर अँधेरा होने पर कुटी में लौटने का निश्चय किया। सो छिप गया।
द्रोपदी को स्थिति समझने में देर न लगी। वे झाड़ी तक पहुँंची अपनी साड़ी का एक भाग फाड़कर साधु को दे दिया। कहा- इसमेें से दो लंगोटी बना लीजिए। अपनी लाज बचा लें। साधु ने कृतज्ञतापूर्वक वह अनुदान स्वीकार किया।
दुर्योधन की सभा में द्रोपदी की लाज उतारी जा रही थी। उसने भगवान को पुकारा। भगवान सोचने लगे इसका कुछ पुण्य जमा हो तो बदले में अधिक दे सकना संभव है। देखा तो साधु की लँगोटी वाला कपड़ा ब्याज समेत अनेक गुना हो गया था। भगवान ने उसी को द्रोपदी तक पहुँचाया और उसकी लाज बची।

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