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Friday, March 27, 2020

EK BANO NEK BANO-HINDI KAHANIYA (एक बनो नेक बनो)


 HINDI KAHANIYA-  

एक बनो नेक बनो

          एक राजा था जो बहुत न्यायप्रिय था। उस राजा का नाम सूर्यदेव था। राज्य में जनता सुखी थी। लोगों को न केवल उचित न्याय मिलता था बल्कि उनकी हर समस्या चाहे वह छोटी हो या बड़ी सुनी और सुलझाई जाती थी। प्रजा तथा उनकी सम्पत्ति की रक्षा की जाती थी।

राजा सूर्यदेव भेष बदलकर राज्य में भ्रमण करते और इस बात का पता लगाते कि प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट तो नहीं है। यदि उन्हें कष्ट या परेशानी होती तो राजा उसे दूर करने का अवश्य प्रयास करते थे।

लोग अपने आप में मशगूल रहते थे। पड़ोसी के यहाँ क्या हो रहा है? इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं होता था। वे केवल अपने बारे में, अपने परिवार के बारे में सोचते थे। गाँव वाले उन छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर जिन्हें साथ मिल बैठकर आपस में सुलझाया जा सकता था राज दरबार में पहुँच जाते थे। इससे राजा सूर्यदेव का अधिकांश समय प्रजा की समस्याएँ सुनने और उन्हें सुलझाने में व्यतीत होता था। पूरे राज्य में खुशहाली ही खुशहाली थी। एक दिन गाँव में रहने वाले सभी ग्रमीणों को आगाह किया गया कि वे अपनी सम्पत्ति की रक्षा स्वयं करें क्योेंकि राजा सूर्यदेव ने गाँवों में कार्यरत सुरक्षा कर्मचारियों को गाँवों से हटाने का निर्णय किया है।

राजा के इस निर्णय से दरबार के सभी मंत्री हतप्रभ से रह गये थे। उनके ख्याल से ऐसा करना उचित नहीं था। क्योंकि राजा का यह कर्तव्य बनता था कि वह प्रजा और उनकी सम्पत्ति की रक्षा करें, उन्हें सही न्याय मिले। राजा सूर्यदेव के इस निर्णय से गाँववालांे में रोष और असंतोष बढ़ने की मंत्रियों को आशंका थी फिर भी उन्होेंने राजा के इस निर्णय का विरोध नहीं किया था।

जल्दी ही गाँवों में कार्यरत सुरक्षा कर्मचारी हटा दिए गए थे। ‘‘राजन् आपके इस निर्णय से लगता है कि गाँव वालों में रोष और असंतोष अवश्य फैलेगा। लूटपाट की घटनाएं बढ़ेगी। इतना ही नहीं लोग गाँवों से पलायन कर शहरों में जाकर बसेंगे। इससे अनाज की पैदावार घटेगी। शहरों में आवास की समस्याएँ भी बढ़ेगी। साहस जुटाकर एक वरिष्ठ मंत्री ने राजा से कहा।‘‘ कहना तो आपका गलत नहीं है मंत्रीवर। राजा सूर्यदेव बुदबुदाए।
‘‘मेरा आपसे अनुरोध है राजन् कि आप अपने फैसले पर दोबारा विचार करें और गाँव से हटाएँ गये सुरक्षा कर्मचारियों को फिर से गाँवों में तैनात करेें। इसी में हमारी भलाई है।’’ राजा सूर्यदेव चुपचाप सुनते रहे। मंत्री क्षणभर मौन रहा। बोला- क्षमा करे राजन् अपनी प्रजा की और उनकी सम्पत्ति की रक्षा करना राजा का कर्तव्य होता है। हमें अपने कर्तव्य को नहीं भूलना चाहिए फिर भी राजा सूर्यदेव कुछ नहीं बोले और मन-ही-मन सोचते रहें।

         गाँवों में सुरक्षा कर्मचारियों को हटाने के बावजूद भी गाँवों में लूटपाट की घटनाएँ बढ़ने की खबरें नहीं मिली थी। गाँव वालों  मे रोष या असंतोष फैलने जैसी बात राज्य में कहीं नहीं थी। जिन छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर लोग दरबार में पहुँच जाते थे, उनमें काफी कमी आई थी।

एक दिन राजा ने उस वरिष्ठ मंत्री को जिसने राजा से अपना फैसला बदलने का अनुरोध किया था, दरबार में बुलाया और बोले- ‘‘मंत्रीवर, जाकर यह पता लगाओं कि गाँवों से सुरक्षा कर्मचारी हटाए जाने के बाद राज्य में कहाँ-कहाँ लूटपाट की घटनाएँ बढ़ी, कहाँ-कहाँ हमारे प्रति प्रजा में रोष व्याप्त है। हमारे उस निर्णय से जिन लोगों को हानि पहुँची है, उन्हें दरबार में हाजिर करो, ताकि उन्हें उचित मुआवजा दिया जा सके।’’ जैसी आपकी आज्ञा राजन्! मंत्री ने कहा और वह दरबार से चला गया।

कुछ दिनों बाद वह मंत्री राजा सूर्यदेव के समक्ष उपस्थित हुआ और बोला- ‘‘राजन्, मैंने स्वयं गाँवों में जाकर पता लगाया है लेकिन आपके प्रति गाँववालों में कोई रोष या असंतोष नहीं है, और न ही कही लूटपाट की घटनाएँ बढ़ी हैं बल्कि गाँवों में रहने वाले लोग संघटित हुए हैं। उनमें एकता आई है।’’ राजन्, पहले वे केवल अपने परिवार के बारे में सोचते थे, लेकिन अब वे अपने पूरे गाँव के बारे में सोचने लगे हैं। लुटेरे, डाकुओं को देखकर पहले गाँववालोें अपने-अपने घरों के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद कर लेते थे। एक साथ मिलकर बैठने से वे एक दूसरे पर विश्वास करने लगे हैं। अब गाँव वाले अपनी छोटी-छोटी समस्याएँ साथ बैठकर आपस में सुलझा लेते हैं। वे अपनी शक्ति को जान गए हैं। उनका आत्म विश्वास बढ़ा है। अब सुरक्षा कर्मचारियों के न होने के कारण पूरा गाँव एकजुट होकर आने वाली हर आपत्ति का सामना करने के लिए हमेशा तत्पर-सा रहता है। लेकिन यह जादू सा चमत्कार एक-एक कैसे हुआ है? क्या आपने इस तथ्य का पता लगाया है मंत्रीवर? राजा सूर्यदेव ने पूछा।

जी हाँ! हुजूर! कहकर मंत्री ने एक किसान को राजा के सामने हाजिर किया। किसान ने राजा को प्रणाम किया। बोला-राजन् हमारे गाँव में पाँच-छः सालोें से एक युवक रहता है। वह युवक बाहर से आया है इसीलिए गाँव वाले उसे परदेशी कहते हैं। उसने गाँव के बाहर एक छोटा सा घर बनवाया था। वह सुबह घर से निकल जाता और शाम को लौट आता। एक शाम परदेशी के घर लौटने के पहले ही उसका घर धूँ-धूँ जलने लगा। गाँव के किसी भी आदमी ने उस जलते हुए मकान को आग को बुझाने की कोशिश नहीं की थी। परदेशी का घर जलकर राख हो गया था। उसने उसी जगह पर फिर से घर बनवा लिया और आराम से रहने लगा।


गाँव से सुरक्षा कर्मचारियों को हटा लेने से गाँव वाले काफी चिंतित और परेशान से थे। किस तरह अपनी सम्पत्ति की रक्षा की जाए, इसी बारे में वे सोच रहे थे कि एक दिन परदेशी ने घर-घर जाकर गाँववालों को समझाया और कहा कि राजा अपने राज्य की शक्ति बढ़ाना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने गाँवों में कार्यरत सुरक्षा कर्मचारियों को हटा लिया है। लेकिन गाँववालें इससे संतुष्ट नहीं हुए थे। परदेशी ने समझाया कि हमारी एकता की शक्ति न केवल हमारी सम्पत्ति की रक्षा कर सकेगी बल्कि उससे राज्य की शक्ति भी बढ़ेगी। उस पदेशी युवक ने गाँववालों को एकता के बारे में विस्तार से समझाया था और गाँववालों को संघटित होने का अनुरोध किया था। आखिर उसकी सारी बातें लोगों की समझ में आ गई और वे उन पर अमल करने लगे। अब गाँव वाले अपनी सम्पत्ति की रक्षा करने में सक्षम हैं महराज, उस परदेशी ने आप-पड़ोस के कई गाँवों में जाकर इसी तरह गाँववालों को संघटित किया है। यह सुनकर राजा सूर्यदेव बहुत खुश हुए, क्योंकि आज वे अपने मकसद में कामयाब हो गये थे।

असल में राजा सूर्यदेव ने अपने भ्रमण के दौरान यह देखा था कि गाँववालों में एकता की कमी है। उसे राजा दूर करना चाहते थे। इसी कारण उन्होंने गाँवों से सुरक्षा कर्मचारी हटा दिए थे। ताकि गाँववाले संघठित होकर अपने अपने गाँवों की रक्षा कर सके। आज गाँव वालों में एकता आई देखकर राजा सूर्यदेव अत्यधिक खुश हुए। उन्होंने परदेशी को न केवल पुरस्कृत किया, बल्कि अपने दरबार में शामिल कर लिया।

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