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Sunday, March 29, 2020

KHOYA BETA HINDI STORY- |खोया बेटा|

KHOYA BETA HINDI STORY- |खोया बेटा|

खोया बेटा

            दूसरा विश्व युद्ध हुआ। लोग संकट में पड़ गए। एक माँ-बाप ने अपने बच्चे को सुरक्षा की दृष्टि से दूर गाँव में रहने भेज दिया। वहाँ मार्ता नामक बुढ़िया उसका पालन-पोषण करने लगी। फिर एक दिन मार्ता की मृत्यु हो गई। बच्चा अकेला भटकने लगा। वह नहीं जानता था कि उसे कहाँ जाना है। उसके माता-पिता के बारे में भी कुछ पता नहीं थी।

मैं मार्ता की झोपड़ी में रहता था। सोचता था कि मेरे माता-पिता मुझे किसी क्षण वापस लेने आ सकते हैं। मेरे रोने चिल्लाने का उस बुढ़िया पर कुछ असर नहीं होता था। वह चाहती थी कि मैं घर के आँगन में खेलूँ और पालतू जानवरों से दोस्ती करूँ।

झोपड़ी में कभी-कभी एक गिलहरी घुस आती। आँगन में नाचती, पूँछ हिलाती, मुँह से आवाजें, चुजों और कबूतरों को डराती रहती।

कभी-कभी शाम को मुझे अपने माता-पिता की याद सताती। अपने खिलौने याद आते। माँ प्यानो बजाती नजर आती। उसके गाने की आवाज मुझे सुनाई देती। सोचता, शायद अब वे मुझे ढूँढ भी पायेंगे कि नहीं!

एक सुबह जब मैं उठा तब मार्ता संसार से जा चुकी थी। वह काफी बीमार जो रहने लगी थी। शाम को जब मैंने घर में लैम्प जलाने की कोशिश की, तो कुछ मिट्टी का तेल जमीन पर गिर पड़ा। बड़ी मुश्किल से माचिस की एक तीली जलाई। उसका जलता हुआ एक टुकड़ा तेल पर गिरा, आग जल उठी। धीरे-धीरे आग झोपड़ी मेें फैलने लगी। उठती लपटें देखकर गाँव वाले इस ओर भागने लगे। कुत्तों के भौंकने की आवाजें आने लगी। मुझे डर था कि लोग मुझे देखते ही मार डालेंगे। मैं वहाँ से भागा। एक जंगल में छिप गया।

प्रातः ठण्ड से ठिठुरता और घबराया हुआ मैं एक दूसरे गाँव में पहुँचा। वहाँ स्त्री-पुरूषोें की भीड़ मेरे चारों ओर इकटठी हो गई। उनकी भाषा में मेरे लिए अनजान थी। उनकी संदेह भरी आँखों से मुझे डर लग रहा था। एक किसान मुझे बोरे में बंद कर, अपने कंधे पर उठाकर घर ले आया। वह मुझे खानाबदोश जिप्सी समझ रहा था। जिनके लिए वहाँ के लोगांे मंे नफरत थी। उस व्यक्ति ने मुझे खाने को रोटियाँ दी। घर की एक कोठरी में बंद कर दिया। उस गाँव की एक स्त्री ओल्गा ने मुझे उस व्यक्ति से खरीद लिाय। वह गाँव के बीमार लोगों का इलाज करती थी। उसके साथ रहते हुए मुझे किसी का भय नहीं था।

उन्हीं दिनों गाँव में प्लेग फैल गया। लोग डर गए। उन्होंने समझाया कि यह अभिशाप मेरे कारण है। उन्होंने मुझे गाँव के पास की नदी में हवा से भरे एक थैले के साथ फैंक दिया। मैं पानी में बहने लगा। बहाव कुछ कम हुआ, तो मैं धीरे-धीरे किनारे पहुँच गया। ऊँचे- ऊँचे सरकंडों से गुजरता मैं नदी से दूर जा निकला। तभी मुझे कुछ चरवाहों की अपनी ओर आने की आवाजें सुनाई दी। मैं पेड़ों के पीछे छिप गया।

कुछ दिन भटकने के बाद मैं एक गाँव पहुँचा। वहाँ एक चक्की वाले ने मुझे अपने पास रख लिया। वह निर्दयी था। वह अपनी पत्नी को मारता पीटता था। मौका पाकर एक दिन अंधेरे में मैं वहाँ से भाग निकला।

अब मैं लेख नामक शिकारी के पास रहता था। मैं उसके लिए चिड़ियाँ पकड़ने के लिए जाल बिछाता था। वह आसमान के गाँवों में चिड़ियाँ बेचता था। उसका घर तरह-तरह की चिड़ियों से भरा रहता। लोग लेख को चिड़ियों के बदले खाने का सामान देते। एक दिन चिड़ियों की तलाश में न जाने वह कहाँ खो गया? मैंने कई दिनों तक उसकी राह देखी। अंत में जब वह नहीं लौटा, तो मैंने वहाँ से जाने का फैसला कर लिया।

इसी बीच एक बढ़ई ने मुझे काम पर रख लिया। दोनों पति-पत्नी सोचते कि मेरे सिर के काले बाल इस गाँव और खेतों में बिजली गिरा सकते है। गाँव में अक्सर तूफान आने और बिजली गिरने से आग लग जाती। रात में आकाश बादलोें से घिरा जाता। लोग भयभीत हो जाते थे।

एक दिन घास की कोठरी में आग लग गयी। आग घर चारों ओर फैलने लगी। मैं वहाँ से भाग निकला। जंगल में रेल की पटरी थी जिस पर धीमी गति से चलने वाली रेलगाड़ी के आखिरी डिब्बे में मैं चढ़ गया। उस स्थान से काफी दूर निकल गया।

अब मैं जिस गाँव मेें पहुँचा, वह रेलवे लाइन और नदी से दूर बसा था। मैंने गाँव के मुखिया के पास काम करना शुरू कर दिया। लोग सोचते अगर जर्मन सैनिकों ने मुझे वहाँ रहते देख लिया, तो वे मेरे कारण पूरे गाँव को सजा दे सकते थे।

मुझे पशुओं को खेतों में चराने के लिए ले जाना पड़ता था। गाँव में जर्मन सैनिकों के खिलाफ युद्ध कर रहे छापामार आते रहते। मुखिया जर्मन सैनिकों को रसद आदि देता था। एक दिन छापामारी ने मुखिया को भारी सजा दी। वह बुरी तरह जख्मी हो गया। गाँव के लोग मुझे पास की जर्मन चैकी पर छोड़ आए। वहाँ एक सैनिक को मुझे जंगल में ले जाकर गोली मारने का हुक्म दिया। जंगल के पास पहुँचकर उसने मुझे भागने को कहा। मैं जैसे ही भागा, पीछे से गोली चलने की आवाज आई। पता नहीं उसके मन में क्या आया, उसने सीधा निशाना नहीं लगाया। मैं बच निकला।

अब मैं जिस जगह रहता था, वहाँ जर्मन सैनिक छापामारी की तलाश में आते रहते थे। एक रात मेरे मालिक ने मुझे जगाकर भाग जाने को कहा! जर्मन सैनिक इस गाँव में धावा बोलने आ रहे थे। मैं झाड़ी में छिप गया। सैनिकों ने मुझे देख लिया। उन्हें शक था कि या तो मैं यहूदी हूँ या कोई जिप्सी। गाँव में ले जाकर उन्होंने मुझे एक कोठरी में बंद कर दिया। वहाँ एक और व्यक्ति भी था। उसके हाथ पीछे की ओर बंधे थे। चेहरे पर संगीन के घाव थे। मैं उसे देखकर डर गया बाहर गाड़ियों में इंजन का शोर होने लगा। तभी कोठरी का दरवाजा खुला। उन्होंने जख्मी आदमी को बाहर घसीट लिया। वे हमें गाड़ी में बिठाकर पास वाले पुलिस स्टेशन ले जा रहे थे। रास्ते में एक पादरी ने हमें देख लिया। गाड़ी ने पुलिस की इमारत में प्रवेश किया। पादरी बाहर ही खड़ा हो गया। जर्मन अफसर ने मुझे देखा, तो मुझे छोड़ देने का हुक्म जारी कर दिया। एक सैनिक मुझे घसीटता हुआ दरवाजे के बाहर ले आया, जहाँ पादरी मेरी प्रतीक्षा में खड़ा था।

पादरी मुझे एक फार्म पर ले आया। फार्म के मालिक को पादरी ने मुझे अपने पास रखने के लिए रहा। वह व्यक्ति मुझे देखकर परेशान हो गया। कारण मुझ जैसा जिप्सी लड़का उसके लिए मुसीबतें खड़ीकर सकता था। लेकिन अन्त में उसने मुझे पास रख लिया।

फार्म के मालिक गाबोंस को बात-बात पर गुस आ जाता। छोटी सी गलती हो जाने पर मेरी टांगों पर कोड़े बरसाने लगता। मेरे कान ऐंठता। मालिक का कुत्ता मुझे देखकर गुर्राता। तंग आगकर मैंने वह जगह छोड़ दी।

मैं दस वर्ष का हो चुका था। मेरी आवाज को न जाने क्या हो गया था? अब मैं बोलने में असमर्थ था।

जाड़ा शुरू होने पर बर्फ ने धरती को ढक लिया था। मैने स्केट्स का एक जोड़ा अपने लिए तैयार किया और अपने बूटों से बांध लिया। पाल की तरह एक कपड़े को अपने सिर के ऊपर फैला दिया। हवा मुझे अनजाने रास्तों पर ले जा रही थी।

गाँव की एक स्त्री लबीना ने मेरी दयनीय दशा देखी। वह मुझे अपने घर ले आई। उसने बहुत कोशिश की कि मैं कुछ बोल सकूँ, परन्तु मैं बोलने में असमर्थ था। गाँव वालों की राय थी कि मुझे जर्मन सैनिकों को सौंप दिया जाए। परन्तु लबीना ने इसका विरोध किया।

लवीना के पति की मृत्यु हो चुकी थी। वह घर में अकेली रहती थी। लोगों के घरो में काम करके गुजारा करती। गाँव के लोग अक्सर उस पर अपने पति को मार डालने का आरोप लगाते, जिसे सुनकर वह क्रोध से पागल हो उठती। लोगों से झगड़ती। एक झगड़े ने उसके प्राण ले लिये। मैं फिर अकेला हो गया था। मैंने इस गाँव से भी कहीं दूर निकल जाने में ही अपनी भलाई समझी।

गर्मी खत्म होने को थी। गेहूँ के पूलों का खेतों में चढेर लगा थाा। पास ही नदी के पुल की जर्मन सैनिक, दिन-रात चैकसी कर रहे थे। एक दिन घोड़ांे पर सवार बहुत से लुटेरे गोलियाँ चलाते गाँव में घुस आए। लोग डर से अपने-अपने घरो में छिप गए। एक लुटेरे ने मुझे झाड़ियों में छिपते देख लिया। मैं वहां से भागने लगा। तभी उसने राइफल के कुंदे से मुझे जख्मी कर दिया। मैं बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। इसी बीच रूसी सैनिक गाँव में आ गए। उन्होंने सभी लुटेरों को पकड़ लिया और घायल गाँव वालों की मरहम पट्टी की।

यह 1944 का पतझड़ था। सेना के अस्पताल में इलाज के बाद मुझे जाने दिया गया। यहाँ से युद्ध भूमि व मोर्चाबंदी काफी दूर थी। मुझे सैनिकोें के साथ ठहरने की इजाजत मिल गयी। दो सैनिक गवरीला और मिल्का मेरी देखभाल करते। अब मैं ग्यारह वर्ष का हो चुका था। पुस्तकों में मेरी रूचि बढ़ गई थी।

एक दिन गवरीला ने मुझे बताया कि युद्ध अब समाप्त हो चुका है। नियमों के अनुसार खोए हुए बच्चों को विशेष केन्द्रों मेें भेजा जाएगा। वहाँ से उनके माता-पिता की खोज खबर ली जाएगी। उसने मुझसे वादा किया कि अगर मेरे पिता-माता नहीं मिले, तो वह मुझे अपने पास रख लेगा।

मुझे बहुत से उपहार देकर एक सैनिक के साथ शहर के अस्पताल में भेज दिया गया। गवरीला ने मेरे बारे में सभी जानकारी लिखकर साथ भेज दी।

एक सुबह मुझे प्रिंसिपल के कमरे में बुलाया गया। उसके साथ एक व्यक्ति था। शायद वह मेरे माता-पिता को युद्ध से पहले जानता था।

KHOYA BETA HINDI STORY- |खोया बेटा|

प्रिंसिपल ने मुझे बैठने के लिए कहा। तभी वह व्यक्ति उठकर साथ वाले कमरे में गया। वहाँ उसने किसी से बातचीत की। जब वह हमारे कमरे में लौटा, तो उसके साथ एक स्त्री और पुरूष था। वे मुझे पहचानने से लगे। मेरा दिल धड़कने लगा। मैंने उनकी तरफ गौर से देखा। वे मेरे निकट आ गए थे। स्त्री मेरे ऊपर झुकी। उसका चेहरा आँसुआंे से भीगा था। व्यक्ति घबराया हुआ था। वह अपना चश्मा बार-बार ठीक कर रहा था। उसके चेहर पर पीड़ा के भाव थे। मेंरे कंधे पर बाई तरफ जन्म से ही एक निशान था जो कमीज हटाने पर साफ दिखाई दे रहा था। निशान देखते ही वे दोनों सिसकियाँ भरने लगे। उन्होंने मुझे अपने लगे से लगा किया क्योंकि वर्षों बाद उनको अपना खोया बेटा मिल गया था।

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