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Thursday, February 11, 2021

Akbar Birbal Stories in Hindi|अकबर बीरबल के लतीफे

अकबर बीरबल के किस्से एवं लतीफे

Akbar Birbal Stories in Hindi

Akbar Birbal Stories in Hindi|अकबर बीरबल के लतीफे
Akbar Birbal Stories in Hindi|अकबर बीरबल के लतीफे

Akbar Birbal Stories

स्वप्न

एक दिन किसी ब्राम्हण ने रात में स्वप्न देखा कि उसे सौ रूपये उधार अपने मित्र से मिले हैं। सवेरे जब नींद खुली तो उसका अच्छा या बुरा फल जानने की इच्छा हुई अपने मित्रों के साथ बैठकर इस बात की चर्चा की धीरे-धीरे खबर बिजली की तरह फैल गई यहाँ तक कि उस मित्र ने भी इस बात को सुना जिससे कि ब्राम्हण ने स्वप्न में सौ रूपये लिए थे।

उसका जी लालच से भर गया उसने चाहा कि किसी तरह ब्राम्हण से रूपया लेना चाहिए और उसके पास रूपया लेने पहुंचा और कहने लगा कि तुमने मुझसे सौ रूपया उधार लिए थे। मुझको जरूरत है इसलिए आज तुम मेरे रूपये दे दो। गरीब ब्राम्हण ने पहले तो सोचा कि मित्र हंसी मजाक कर रहा है। परन्तु जब वह हाथा पाई करने को तैयार हुआ और बहुत भय आदि दिखाया तो ब्राम्हण के भी प्राण सूखने लगे।

ब्राम्हण बेचारा दिन भर मेहनत करता तब उसको खाने को मिलता था, घर में फूटी कौड़ी भी नहीं थी। सौ रूपये कहाँ से देता विवश हो हिम्मत बांध तो भी मित्र का सामना करने को खड़ा हो गया, अब तो मित्र के कान खड़े हुए उन्हें आश थी कि डरकर ब्राम्हण देवता रूपया दे देगा। लेकिन अब उसको इस आशा पर पानी फिरता दिखाई दिया तो उसने ब्राम्हण को धमकी दे अपने घर का रास्ता लिया। जाते-जाते कह गए कि मैं तुझसे रूपये जरूर वसूल कर लूंगा और गवाही में सब मित्रोें तथा पड़ोसियों को उपस्थित करूंगा जिसके सामने तुमने रूपया पाना स्वीकार किया है।

ब्राम्हण देवता करते भी क्या ईश्वर पर भरोसा था, उसी का नाम जपने लगे।

दूसरे दिन मित्र महाशय ने ब्राम्हण पर उधार रूपया लेने का अभियोग लगाकर दावा कर दिया। न्यायाधीशों ने दोनों तरफ की बात ध्यान देकर सुनी। लेकिन कोई फैसला न कर सके। क्योंकि गवाहों ने स्वप्न में रूपये लेना ब्राम्हण के द्वारा स्वीकार करना बतलाया। सोच विचार कर न्यायाधीश ने यह मामला बादशाह के पास भेज दिया।

बादशाह ने मामले पर अच्छी तरह गौर किया, यह जानते हुए कि मित्र सरासर दगाबाजी कर रहा है, बादशाह को निबटाने की कोई तरकीब न सूझी लाचार होकर बादशाह ने बीरबल को बुलाया। सब मामला समझा दिया कि बेचारे ब्राम्हण को दगाबाज मित्र ठगना चाहता है। 

इसका ऐसे तरीके से न्याय होना चाहिए दूध का दूध और पानी का पानी अलग हो जाए। बीरबल ने आज्ञा मानकर एक बड़ा सा दर्पण मंगवाया उसके बाद सौ रूपये उन्होंने ऐसी होशियारी से रख दिए कि दर्पण में रूपयों की छाया दिखाई पड़े। जब रूपये दर्पण में दिखने लगे तब बीरबल दगाबाज मित्र से बोले कि जिस रूपये की छाया दिखती है उसे तुम ले लो।

मित्र महाशय ने अचम्भा जाहिर करते हुए कहा कि यह कैसे ले सकता हूँ यह तो केवल रूपये की परछाई है।

मौका पाकर बीरबल बोले कि ब्राम्हण ने भी तो स्वप्न में तुमसे रूपया पाया था। वह भी तो परछाई थी फिर तुम असली रूपया क्यों चाहते हो महोदय की गर्दन झुक गई कुछ जवाब न बना तो लाचार होकर खाली हाथ चलने को तैयार हुए तो बीरबल बोले ब्राम्हण को आज परेशान किया है। उसके कामों में रूकावट डाली है। अतः बिना सजा पाये यहां से नहीं जा सकोगे।

बीरबल ने समझा कर उस दगाबाज को जुर्माने की सजा दी जो रकम जुर्माने की मिली वह उन्होंने उस गरीब ब्राम्हण को हरजाने में दे दी इस तरह गरीब ब्राम्हण हँसी खुशी घर वापस आया।


Akbar Birbal Stories in Hindi|अकबर बीरबल के लतीफे
Akbar Birbal Stories in Hindi|अकबर बीरबल के लतीफे

कितनी चूड़ियाँ कितने बाल

एक दिन दरबार हाल में बैठे बादशाह अकबर ने बीरबल से एकाएक यह सवाल कर दिया क्यों बीरबल तुम तो अपनी बीवी का हाथ दिन में दो-एक बार अवश्य स्पर्श करते होंगे।

जी बादशाह सलामत! बीरबल ने होले से जवाब दिया।

बादशाह अकबर ने आगे पूछा क्या ये बता सकते हो कि तुम्हारी बीवी के हाथ में कितनी चूड़ियाँ हैं?

बीरबल यह सुनकर असमंजस में पड़ गया न तो इससे पहले बादशाह सलामत ने ऐस सवाल कभी किया ही था और न ही आज तक बीरबल ने बीवी के हाथ की चूड़ियों की कभी गणना की थी।

सच तो यह था कि वे झूठ भी न बोलना चाहते थे। कुछ देर सोच विचार के बाद उन्होंने जवाब दिया जहांपनाह असलियत तो यह है कि मेरा हाथ तो बीवी के हाथ से दिन मंे एकाध पर स्पर्श करता होगा किन्तु आपका हाथ तो दाढ़ी में दिन में बीसियों बार लगता हैं। भला आप ही बताइये कि आपकी दाढ़ी में कितने बाल हैं?

बादशाह अकबर बीरबल की बात सुनकर बहुत शर्मिन्दा हुए।

छेड़छाड़

अकबर बादशाह और बीरबल में अकसर मजाक होता रहता था। एक दिन वे दोनों एक दूसरे से छेड़छाड़ कर रहे थे।

बादशाह ने कहा बीरबल तुम्हारी स्त्री अत्यन्त सुन्दर है।

बीरबल ने कहा जी सरकार! मैं पहले भी ऐसा ही समझा करता था। पर जब से बेगम साहिबा को देखा हैं, मैं अपनी स्त्री को ही भूल बैठा हूँ।

बादशाह एकाएक झेंप गये और उस दिन से फिर उन्होंने ऐसा मजाक नहीं किया।

कंजूस का दृश्य

दिल्ली में एक बड़ा ही मक्खी चूस रहता था कठिन परिश्रम करने पर भी जो कुछ उसे मिलता था उसके थोड़े में अपना पेट भरता तथा बाकी जमा करता था। इस तरह उसके पास कई जवाहरात हो गए थे उसका रहन सहन ऐसा था कि लोगों को सहसा विश्वास ही नहीं हो सकता था कि इसके पास जवाहरात होंगे। 

उसका घर एक मामूली फँूस की झोपड़ी थी जिसमें टूटा फूटा छोटा सा एक सन्दूक मुमकिन है बाबा आदम जमाने की थी। उसी में अपने जवाहरातों की गठरी छिपाये रखी थी, देवयोग से एक दिन उस फूस की झोपड़ी में आग लग गई। कंजूस यह देखकर दहाड़ मारकर रोने लगा। उसका शोर सुनकर अड़ोस-पड़ोस के लोग आ गए और आग बुझाने में मदद करने लगे किन्तु वह बुझने के बजाय अधिक बढ़ गई। आग की लपटों को बढ़ता देखकर कंजूस और भी जोरों से चिल्ला कर रोने लगा। उसका रोना सुनकर उसके पास ही एक स्वर्णकार उसको डांटकर बोला कि कांसे की कढ़ाई के लिए क्यों जान दे रहा हैं?

कंजूस यह सुनकर बोला-भाई तुम तो कढ़ाई को जलते देख रहे हो किन्तु मैं तो अपने जवाहरात को देख रहा हूँ। यह सुनकर स्वर्णकार बोला कि वह धन कहां छिपा है। कंजूस ने उंगली के इशारे से उस स्थान को बतला दिया। जहां सन्दूक था। स्वर्णकार के जी में लालच समा गया वह बोला कि बाकी रकम ले लूँगा। अध तजसिंह बुध सर्वस जाता। यह ख्याल कर कंजूस ने स्वर्णकार को इजाजत दे दी। करता भी क्या कुछ नहीं से, तो थोड़ा पाना अच्छा है।

स्वर्णकार भी जान जोखिम में डाल लालच वश धधकती हुई अग्नि में कूद पड़ा और सन्दूक लिए बाहर आया जब आग शान्त हुई तो सुनार ने कंजूस को केवल सन्दूक देकर बाकी जवाहरात खुद ले लिए यह देख कंजूस ने आनाकानी की तो स्वर्णकार बोला कि तुमने पहले ही मान लिया था जो मैं चाहुँ वह तुम्हें दे दूँ। कंजूस ने नम्र होकर कहा कि भाई साहब आपने जानपर खेलकर ऐसा उपकार किया है, अतएवं आप आधा धन ले लो बाकी आधा मुझे स्वीकार है। स्वर्णकार पलटकर बोला कि मेरे एवं आपके बीच पहले ही शर्त हो चुकी थी कि मैं जो चाहुँ उसे आपको दे दूँ अब चालाकी से काम नहीं चलेगा।

बात दोनों में बढ़ गई। कंजूस ने बहुतेरा प्रयास आधा जवाहरात पाने का किया अन्त में लाचार होकर बादशाह के यहां नालिस की। बादशाह ने पेचीदा मामला समझकर बीरबल को बुलाया और सारा हाल दोनांे से बयान करवाया थोड़ी देर के लिए बीरबल विचार मग्न हो गए बाद में बीरबल ने स्वर्णकार से पूछा कि तुम दोनों के बीच क्या शर्त तय हुई थी? 

स्वर्णकार बोला गरीब परवर हम दोनों के बीच यह शर्त तय हुई थी कि उस धधकती आग में प्रवेश कर जो जवाहरात वाली संदूक को निकाल लायेगा वह जो पसन्द करे दूसरे को देवे बाकी आप लेवे। यह सुनकर बीरबल ने कंजूस से पूछा कि जो बातें स्वर्णकार कहता है क्या सही हैं? कंजूस ने स्वीकार किया तब बीरबल ने कहा फिर तुम क्यों नहीं निपटारा कर लेते। जब शर्त हो चुकी थी तो जो कुछ वह देता है ले लो। कंजूस ने दुखी होकर कहा कि आलीजाह वह तो केवल संदूक मुझे देकर सब जवाहरात खुद ले रहा है।

बीरबल ने स्वर्णकार को बुलाकर कहा कि तुम्हें कौन सी चीज पसन्द है? स्वर्णकार बोला हुजूर जवाहरात बीरबल यह सुनकर बोले तो फिर बात इतनी क्यों बढ़ाई। जवाहरात उसे वापिस दे दो। सन्दूक तुम ले लो।

स्वर्णकार अवाक सा रह गया बीरबल बोला कि तुम्हीं ने तो अपनी शर्त में बतलाया कि जो मैं पसन्दू करूंगा वह इन्हें दे दूगां। सो तुमने जवाहरात पसंद करें है। अतएवं इन्हें दे दो बाकी सन्दूक तुम ले लो स्वर्णकार कुछ न बोल सका। वह जानता था कि बीरबल ने न्याय का अस्वीकार करूंगा तो जेल की हवा खानी पड़ेगी ज्यादा लालच का यही नतीजा होता है यह सोचता हुआ खाली सन्दूक लेकर स्वर्णकार घर को लौटा। कंजूस को उसके जवाहरात मिल गये। उसे लेकर बीरबल की चतुराई से बड़ा प्रसन्न हुआ क्योंकि उन्होंने दूध और पानी को बिलकुल अलग-अलग कर दिया था।

शहजादा और सौदागर पुत्र

बादशाह शहजादे और एक सौदागर के पुत्र में बड़ी मित्रता थी। यहाँ तक दोनों साथ-साथ ही उठते खाते पहनते सोते थे। दोनों प्रायः इधर-उधर की गपशप में अपना समय निकाल देते थे। उनके माँ बाप बड़े दुःखी और परेशान रहा करते थे।

सौदागर और बादशाह ने उनकी मित्रता कम कराने के लिए बीरबल से कहा एवं सोचा कि निश्चय ही वह उन दोनों की मित्रता में किसी युक्ति से कोई विघ्न डाल ही देगा।

एक दिन जब कि दोनों शहजादा और सौदागर का पुत्र बाग में बैठे हुए थे बीरबल अपने रथ में पहंुंचे और शहजादे को संकेत से बुलाया। पास आने पर उन्होंने उसके कान में अपना मुँह रखा और कहा जाओ यह कहकर वे चले आये।

उधर सौदागर पुत्र ने शहजादे से पूछा कि बीरबल ने तुमसे क्या कहा था? शहजादे ने उत्तर दिया कि उसने तो कुछ भी नहीं कहा वैसे ही बुलाया था।

यह सुनकर सौदागर पुत्र ने सोचा अवश्य ही शहजादा हमसे कुछ छिपा रहा है। वरना बीरबल ने जो कुछ भी कहा उसे बता देता।

ऐसे ही दो तीन दिन बाद बीरबल ने फिर शहजादे को बुलाया और उसी तरह बिना कहे वापस भेज दिया। सौदागर पुत्र के पूछने पर उसने उत्तर दिया कि आज भी मुझसे कुछ नहीं कहा।

अब तो सौदागर पुत्र के हृदय में पूरी तरह से संदेश हो गया और वह शहजादे से काफी खिंचाव रखने लगा। शहजादा भी उसके इस बर्ताव से अप्रसन्न हुआ।

आखिर उन दोनों की मित्रता एक दम टूट गई और अपना काम करने लगे। सौदागर और बादशाह को भी इनसे बड़ी प्रसन्नता हुई और बीरबल को इनाम दिया गया।

मुर्गी का अण्डा

अकबर बादशाह को एक दिन बीरबल की हँसी उड़ाने की इच्छा हुई। अतएवं उन्होने उनके आने से पहले बाजार से मुर्गी के अण्डे मंगवाकर अपने दरबारियों को एक-एक अण्डा बांट दिया। केवल बीरबल रह गए।

तदोपंरात वह ज्यों ही दरबार में हाजिर हुए, बादशाह ने कहा दीवान जी हमने रात में एक बड़ा अजीब सपना देखा। उसका तात्पर्य यह निकला हैं, जो आदमी इस हौज में डुबकी लगाकर एक मुर्गी का अण्डा न निकाल पायेगा, उसे दो बाप का माना जायेगा। मेरा विचार हैं, सबकी बारी-बारी से परीक्षा ली जाये। सपने की असलियत का भी पता चल जायेगा।

बादशाह की अनुमति से सब दरबारियों ने हौज में डुबकी मारी एवं हाथ में मुर्गीं का अण्डा लेकर बाहर निकले। जब बीरबल की बारी आयी तो वह हौज में डुबकी लगाकर खाली हाथ निकल आये, किन्तु उनके मुख से कुकडु कू की आवाज निकल रही थी।

बादशाह ने पूछा- दीवान जी तुम्हारा अण्डा कहा गया? जल्दी से दिखलाओं।

बीरबल ने उत्तर दिया हुजूर बादशाह सलामत! तमाम अण्डे देने वाली मुर्गियों के बीच में मैं ही एक मुर्गा हूँ।

उनके आशय को समझकर सब दरबारी सहम गये। जबकि बादशाह के होंठो पर मुस्कुराहट खेलने लगी।

अंगुली का संकेत

अकबर बादशाह के दरबार में उच्च घराने का एक बड़ा धनहीन सरदार रहता था। उसकी आजीविका उपार्जन करने के लिए कोई ऐसा व्यवसाय ही न था जिससे उसका खर्च भली भांति चलता। फिर भी यथा समय दरबार में जाकर अपने बड़ों के चलाये नियम दरबार का पालन किया करता था। वह दोनों समय के दरबार में ठीक समय पर उपस्थित हुआ करता था। बड़ी जोड़-तोड़ करके एक जोड़ा वस्त्र इसी कार्य के लिए रख छोड़ा था। दरबार से फुरसत पाने पर घर जाकर चक्की पीसकर अपनी अजीविका चलाता था। सिवा एक जोड़ी चक्की के उसके पास और कुछ भी धन शेष न रह गया था। ऐसी लाचारी की दशा में भी सरदार अपने बाप-दादों का बनाया नियम यथा शक्ति तोड़ता नहीं था।

एक दिन पिसाई का काम बहुत ज्यादा था जिससे कार्य विवश्ता के कारण लाचार होकर दरबार में उपस्थित न हो सका। तन्मय होकर चक्की चलाता ही रहा। नित्य के समय पर बादशाह की सवारी निकली और मियां सरदार के घर के पास से होकर चली। सरदार का घर जन साधारण गृहस्थी की तरह कच्चा और एक मंजिल बना हुआ था। दीवार में कई जगह दरार फट कर अकस्मात राह चलते हुओं का ध्यान अपनी तरफ खींचकर गृह स्वामी का उपहास करा रही थी।

मियां सरदार चक्की चलाते चलाते घौंसा बजना सुनकर अपने आंगन से राजा की सवारी देख रहे थे। अचानक राजा की दृष्टि भी सरदार पर जा पड़ी। राजा ने सरदार को पहचान लिया। दूसरे दिन दरबार में उपस्थिति होने पर राजा के मन में मियां सरदार के सम्बन्ध में उनकी वर्तमान स्थिति की विशेष जानकारी प्राप्त करने की इच्छा हुई मन की बात मन ही में दबाकर खामोश रह गये।

कुछ दिनों के बाद एक दिन फिर बादशाह का दरबार बड़े समारोह के साथ लगा। मियां साहब भी अन्य सरदारों की तरह सज धजकर अपने स्थान पर बैठे हुए थे। हिन्दू मुसलमान सभी दरबारों भी योग्यतानुसार अपने स्थानों पर विराजमान थे। 

इसी बीच राजा आकर सभा के मध्य एक सोने के सिंहासन पर बिराजमान हुए, बारी-बारी सबकी तरफ देखते हुए राजा की दृष्टि उन मियां जी पर पड़ी और भूली बात फिर से स्मरण हो आई पहली बात पूछने के लिए आज फिर उनका मन चंचल हो उठा। परन्तु विचार विनिमय के सामने हार माननी पड़ी बात भी सच्ची थी। सबके सामने किसी दरबारी का पर्दाफास करना राजा को शोभा नहीं देता था। मियां दरबारी ने उस संकेत का तात्पर्य अपने घर समझकर अपने पेट पर अंगुली रखते हुए बादशाह को दिखलाया।

बादशाह की सभा लुच्चों से खाली नहीं थी। अच्छी बात पर चाहे उनका ध्यान भले ही न जाता, परन्तु ऐसी बातें तो उनकी आँखों पर नाचा करती थी। कितनों ने मियां और बादशाह के उपरोक्त संकेत को देख लिया था। बस उनको लेकर इनके मन में अनेकों प्रकार के संकल्प विकल्प उठने लगे दरबार समाप्त होते ही एक धूर्त जाकर मियां सरदार जी का घर देख आया। दूसरे दिन कई दुष्टों की मण्डली बनाकर मियां जी के मकान पर पहुंची जैसा गृहस्थ का धर्म है मियां जी ने सबको बडे आदर सत्कार के साथ बैठाया। थोड़ी देर के बाद चण्डाल चैकड़ी के मुखिया ने मियां जी से पूछा महाशय जो कल दरबार के समय बादशाह ने आपसे क्या कहा था? 

वह सांकेतिक बात हम लोगों के समझ ने न आई। हम उसे जानने के लिए लालयित है। मियां सरदार के मन में संदेश हो गया उन्होंने अनुमान लगाया कि बादशाह के संकेत करने से इन बातों के मन में मेरे संबंध में संदेह उत्पन्न हो गया है। इनको उल्लू बनाकर फंसाना चाहिए। उसने उत्तर दिया बहुत सी बातें कहने योग्य नहीं होती, उनका भेद खुल जाने से बड़ा नुकसान होता है।

चण्डाल चैकड़ी का मुखिया आग्रहपूर्वक जोर देकर पूछने लगा तब फिर मियां सरदार जी बोले देखो भाई बादशाह ने आप लोगों की तरफ इशारा करके मुझसे पूछा था कि इन लोगों की कोई बात जानते हो। मैंने उस बात को वहीं रोक अपनी अंगुली पेट पर रखकर समझा दिया कि हमारे पेट में है।

मियां जी की फेर बदले की बातों ने चण्डाल चैकड़ी को घबरा दिया और सबने अपने भविष्य की भलाई के लिए उनको रिश्वत देने का विचार प्रकट किया, परन्तु मियां जी की गर्दन टेढ़ी-मेढ़ी बनी रही है। सब घर से हैसियत के अनुसार कोई दो सौ और पांच सौ की गठरी तक ले आए। 

मियां जी मजे में पालथी मारकर ये सब चरित्र देख रहे थे वे सब कपट मूर्ति अपनी अपनी भेंट सरदार के कदमों पर रखकर बोले सरदार जी कृपा कर हमारी ये बातें अपने ही पेट में रखना, कहीं खुलने न पावें, हम इसी के लिए आपकी यह भेंट दे रहे है। मियां जी बड़ी गंभीरता से बोले कि आप लोगों की यही इच्छा है तो ऐसा ही करूंगा। आप लोगों पर ईश्वर प्रसन्न है। जो कल के संकेत की बाते समझकर पहले से ही होशियार हो गये।

चाण्डाल चैकड़ी इस प्रकार घूंस देकर वहां से विदा हुई।

दूसरे दिन बादशाह स्वयं मियां सरदार के पास गये। मियां जी ने बाअदब सलाम कर बादशाह को एक कुर्सी पर बैठाया फिर घूस में मिली रकम उनके सामने रखकर बड़ी कृतज्ञता प्रकट करने लगे। 

बादशाह उस गरीब के घर एकाएक इतना काफी द्रव्य देखकर बोले मियां जी आप चक्की पीसकर अपनी जीविका चलाते थे तो फिर यह द्रव्य कहां से आया? मियां जी मुस्कराते हुए बोले- पृथ्वीनाथ कल आपने दरबार में जो मेरे लिए संकेत किया था, यह सब उसी का फल है। बादशाह को इतने से संतोष न हुआ वे उसके मुख से और सारी बातें स्पष्ट सुनना चाहते थे।

मियां सरदार ने सारा किस्सा कह सुनाया। बादशाह उसकी चालाकी से अति प्रसन्न हुए और घूंस में मिला धन उसको देकर लौट गए। दूसरे दिन वहीं सरदार दरबार में एक खास पद पर नियुक्त कर लिया गया। दुष्ट दरबारियों का मन एक दम टूट गया और वे फिर किसी कर्मचारी का छिन्द्रानवेषण करते नहीं सुने गए

अप्सरा और पिशाचनी

एक दिन बादशाह हो अप्सरा और पिशाचनी देखने को बहुत ज्यादा इच्छा हुई। बीरबल सभा में आया तो बादशाह ने उन दोनों को दिखलाने के लिए उसे बाध्य किया। बीरबल बहुत अच्छा यह कहकर तत्क्षण अपने घर चला आया और संध्या के समय एक वेश्या के घर जाकर उसे दूसरे दिन बादशाह के पास चलने के लिए समझा बुझाकर ठीक कर लिया। जब सवेरा हुआ तो अपनी स्त्री और वेश्या को लिए हुए बादशाह के पास पहंुचा। बादशाह के सामने अपनी स्त्री की ओर इशारा कर बोला गरीब परवर यह स्वर्ग की अप्सरा है क्योंकि इसकी सेवाओं से मुझे बड़ा आराम पहुंचता है। बादशाह ने पूछा वह कैसे? अप्सरायें तो परम सुन्दरी हुआ करती है। यह तो एकदम काली और महादुर्बल है। शास्त्रों में भी अप्सराओं की सुन्दरता अद्वितीय बतलाई गई है।

बीरबल बोला पृथ्वीनाथ सुन्दरता तो गुण की होती है। चमड़े की नहीं, इस औरत से मुझे स्वर्ग क समान सुख मिलता है। बीरबल ने उस बाजारू वेश्या को लाकर बादशाह के सामने हाजिर किया। बादशाह ने कहा वाह यह तो बड़ी सुन्दर है इसके आभूषण और स्वच्छ वस्त्रों से इसकी सुन्दरता और भी बढ़ गई है बीरबल बोला पृथ्वीनाथ यह सब केवल फांसने की कुंजी है। यह पिशाचिनी जिसको लग जाती है उसका सर्वस्व अपहरण करके ही पिण्ड छोड़ती है। बीरबल के ऐसे उत्तर से बादशाह बहुत प्रसन्न हुए।

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