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Sunday, February 21, 2021

Hilly dharti hindi story- हिली धरती


Hilly dharti hindi story- हिली धरती
Hilly dharti hindi story- हिली धरती

 हिली धरती

चंदनदास संगीतकार थे। एक छोटी सी रियासत कीरतपुर में रहते थे, पर उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई थी। कीरतपुर के राजा ने चंदनदास को रहने के लिए बड़ी हवेली दे रखी थी। चंदनदास ने उसी में संगीत विद्यालय भी खोल लिया था।

चंदनदास सारा दिन शिष्यों को गायन वादन सिखाने में लगे रहते थे। जब राजा बुलाते तो दरबार में जा पहुँचते। शेष सारा समय संगीत की साधना में बीतता। रहन-सहन साधारण ही था। उन्होंने अपना जीवन संगीत को समर्पित कर दिया था।

एक दिन की बात, बरसात का मौसम था। ठण्डी-ठण्डी हवा चल रही थी। हवेली के बड़े कक्ष में चंदनदास अपने तीन शिष्यों के साथ बैठे थे। चंदनदास और उनके तीनों शिष्य तन्मय होकर गा रहे थे। एकाएक चंदनदास का ध्यान भंग हुआ। उन्हें लगा जैसे किसी ने जोर से धक्का दिया हो। नेत्र खोलकर सामने देखा, तो दीवार हिलती नजर आई। फिर तो पूरा कक्ष डोल उठा। जमीन थरथराने लगी। अजीब डरावनी आवाज उठ रही थी।

‘‘बाहर भागो, भूकम्प।’’-चंदनदास बस इतना ही कह सके। तभी कक्ष का फर्श फट गया, दीवारें झुक गई। छत से पत्थर गिरने लगे। सब तरफ धूल ही धूल छा गई। कीरतपुर तथा आप-पास के क्षेत्र में भूकम्प आया था। अनेक भवन गिर गये थे। अनेक लोग घायल हुए थे। चंदनदास की हवेली पूरी तरह से ढह गई थी। चंदनदास तथा उनके तीनों शिष्य हवेली के मलबे में दब गये थे।

किसी ने राजा को खबर दी तो वह स्वयं चंदनदास की हवेली पर पहुँचे। शानदार हवेली एक डरावने खंडहर में बदल गई थी।

राजा का आदेश था, चंदनदास की हवेली का मलबा हटाने का काम तेजी से शुरू हुआ। तभी धरती फिर डोल उठी। भूकम्प का एक नया झटका कीरतपुर को हिला गया। फिर तेज बारिश शुरू हो गई। कीरतपुर की जनता बुरी तरह डर गई। बहुत सारे लोग तो पहले ही नगर छोड़कर चले गए थे। दूसरे भूकंप के बाद बचे खुचे लोग भी भागने लगे। मलबे में दबे चंदनदास को होश आया, तो वह टटोलते हुए उठने लगे। सब तरफ घुप्प अंधेरा था। वह एक-एक करके शिष्यों को पुकारने लगे-‘‘अजय, दीपक, राजसिंह कहाँ हो तुम?’’

कुछ पल सन्नाटा रहा, फिर उन्हें सुनाई दिया-‘‘गुरूदेव, हम तीनों जीवित है। अंधेरे के कारण कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। खड़े होने का प्रयास करते हैं, तो सिर पत्थरों से टकराता है।’’

‘‘ईश्वर को धन्यवाद है।’’-चंदनदास ने प्रसन्न स्वर में कहा-‘‘हम लोग मलबे के नीचे दबे हुए है। घबराना मत, शायद मलबा हटाया जा रहा होगा। हम जल्दी ही बाहर आ जायेंगे।’’

तभी उनके शिष्य अजय की आवाज आई-‘‘गुरूदेव, दीपक की तबीयत खराब हो रही है। वह बोल नहीं रहा है। जोर-जोर से साँस ले रहा है।’’

चंदनदास मन ही मन प्रार्थना करने लगे-‘ईश्वर मेरे शिष्य की रक्षा करो। बचा लो उसे। चाहे मेरे प्राण ले लो।’ एकाएक थोड़ी दूर पर एक चमक दिखाई दी, जो तेज होती जा रही थी। चंदनदास उसी तरफ टकटकी लगाए देखते रहे। उन्होंने देखा कि वे चारों मलबे के नीचे फँसे हैं, सामने ही दीपक बेहोश पड़ा दिखाई दिया।

‘‘यह प्रकाश कैसा है?’’-चंदनदास के होठों से निकला। फिर उन्हें कहीं से पानी की टप-टप सुनाई दी।

तभी एक आवाज आई-‘‘चंदनदास तुम्हारा शिष्य घबराहट के कारण बेहोश हो गया है। लेकिन तुम मत घबराना। पानी की जो बूँद टपक रही हैं, उन्हें इसके मुँह में डाल दो।’’

‘‘लेकिन आप है कौन? यह प्रकाश कैसा है?’’-चंदनदास ने डरे स्वर में पूछा।

-‘‘पहले अपने शिष्य के प्राण बचाओ। बाकी सब बाद में पूछना।’’

चंदनदास ने देखा, जहाँ से प्रकाश आ रहा था, वहीं से पानी की बूँदें टपक रही थीं। अब अधिक सोच-विचार का समय नहीं था। चंदनदास ने बूँदों के नीचे हथेली फैला दी। कुछ पानी इकटठा हुआ तो उसे दीपक के मुँह में डाल दिया। ऐसा उन्होंने कई बार किया। यह करते हुए वह लगातार सोच रहे थे-‘यह प्रकाश कहाँ से आ रहा है? और ये पानी की बूँदें......कहीं कुछ गड़बड़ न हो।’

पर ज्यादा सोचना नहीं पड़ा। कुछ पल बाद दीपक का शरीर काँपा और उसने आँखें खोल दीं। चंदनदास की आँखों में आँसू बहने लगे। उनके काँपते होठों से निकला-‘‘आप कौन है? आपने दीपक के प्राण बचाए हैं। कृपा करके अब तो बताइए?’’

कुछ देर के मौन के बाद फिर आवाज आई-‘‘अभी उसका समय नहीं आया है। ईश्वर का भजन करो, उसे धन्यवाद दो। इतना ही बहुत है।’’

चंदनदास ने फिर कुछ नहीं पूछा। उन्होंने शिष्यों को इशारा किया और भजन गाने लगे। तीनों शिष्यों ने भी उनका साथ दिया। धरती के अन्दर उनका स्वर गूँजने लगा। चारों तन्मय होकर भजन गाते रहे।

ऊपर बारिश थम गई थी। गिरी इमारतों का मलबा हटाने का काम शुरू कर दिया गया था। हवेली का मलबा हटाते मजदूरों के कानों से गाने की आवाज टकराई, तो वे चैंक उठे। ‘शायद नीचे कुछ लोग अभी जिंदा है।’-उन्होंने आपस में कहा और मलबा तेजी से हटाने लगे। गाने की आवाज अब और भी तेज हो गई थी।

कुछ देर बाद चंदनदास और उनके तीनों शिष्यों सही-सलामत बाहर निकाल लिए गए। चंदनदास ने देखा, सूरज डूब रहा था। दूर- दूर तक टूटी-फूटी इमारतें नजर आ रही थीं। यह दृश्य देखकर चंदनदास का मन काँप गया। वह सिर थामकर वहीं बैठ गए। तब तक राजा को भी चंदनदास के जीवित होने का समाचार मिल गया था। उन्होंने उन्हें बुलाने के लिए सैनिक भेज दिए।

सैनिक आए तो चंदनदास ने कहलवा दिया-‘‘अभी नहीं, बाद में आऊंगा।’’ वह अपने शिष्यों के साथ वहीं खुले में बैठकर भजन गाने लगे। उसी समय जैसे जमीन के नीचे गा रहे थे। मन ही मन दोहरा रहे थे-‘हम लोगों की जीवन रक्षा करने वाले आप कौन है? मैं आपके दर्शन चाहता करना चाहता हूँ।’

अंधेरा हो गया, बारिश फिर होने लगी। आस-पास खडे़ लोग एक-एक करके चले गए, पर चंदनदास अपनी जगह से न हिले। वह मन ही मन प्रार्थना दोहरा रहे थे।

एकाएक अँधेरे में प्रकाश फूटा। हवेली का खंडहर जगमगा उठा। आवाज आई-‘‘ चंदनदास, मैं मणिधर हूँ। तुम्हारी हवेली के नीचे एक हजार वर्षों से रह रहा हूँ। अगर भूकंप न आता, तो शायद तुम लोग मेरे निकट कभी न आ पाते। मुझे देखने की जिद न करो। लो, मैं तुम्हें अमूल्य हीरे-मोती देता हूँ। हवेली के नीचे धरती में अकूत धन गड़ा हुआ है।’’

इसके बाद उस प्रकाश में अनेक रंग के हीरे-मोती उछलते दिखाई दिये। चंदनदास अपने स्थान पर अचल बैठे रहे। उन्होंने कहा-‘‘मुझे सबसे अमूल्य रत्न आपसे मिल गया है। मेरे और तीनों शिष्यों के प्राण आपने बचाएं हैं। अब और कुछ नहीं चाहिए मुझे। मैं आपको धन्यवाद देता हूँ।’’ कहकर उन्होंने हाथ जोड़कर आँखें मूँद लीं।

अजय दीपक और राजसिंह भी उस अद्भुत प्रकाश में उछलते हीरे-मोती देख रहे थे। दीपक ने अजय से कहा-‘‘चुप रहो। गुरूजी को चाहे धन की आवश्यकता न हो, पर हमें है। आओ, हम अंदर चलकर खजाना निकाल लें।’’ और फिर दीपक उस गडढे में कूद पड़ा, जहाँ से कुछ देर पहले वह बाहर आया था।

एकाएक जोर से गड़गड़ाहट हुई। धरती काँप उठी। भूकम्प ने तीसरी बार झटका दिया था कीरतपुर की धरती फट गई। चंदनदास डरी-डरी आँखों से देखते रह गए। उनके दोनों शिष्य मूर्तिवत खड़े थे। दीपक के गड्ढे में गिरते ही फटी हुई धरती जुड़ गई थी।

‘‘दीपक, यह तूने क्या किया!’’-चंदनदास के होठों से निकला, लेकिन अब कुछ शेष नहीं था। विचित्र प्रकाश, उछलते हुए हीरे, मोती एक साथ गायब हो गए थे।


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