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Sunday, February 21, 2021

naach utha haathee hindi kahani- नाच उठा हाथी

नाच उठा हाथी

naach utha haathee hindi kahani- नाच उठा हाथी
naach utha haathee hindi kahani- नाच उठा हाथी


कुत्स मुनि जी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पुत्र का नाम रखा वत्स। पांच साल का होने पर उसका उपनयन कर दिया। इसके बाद पढ़ने के लिए उसे महर्षि भृगु के आश्रम में भेज दिया। कावेरी नदी के तट पर आश्रम था। चारों ओर हरियाली। वन में पशु-पक्षी खूब मौज करते थे। भृगु भी अपने छात्रों से बड़ा स्नेह करते थे। उन्हें तरह-तरह की कथाएं सुनाकर शिक्षा देते थे। वत्स अपने गुरु को देखता। उसके लिए गुरु देवता के समान थे। वह उनकी देखा-देखी आचरण करता था। गुरु जी तीन बार कावेरी में स्नान किया करते। वत्स भी वैसा ही करता। मन लगाकर पढ़ता और महिर्ष भृगु की खूब सेवा करता।

लगन से वत्स ने शीघ्र ही पढ़ाई पूरी कर ली। इसके बाद वत्स कल्याण तीर्थ में आ गए। वहाँ तप करने लगे। मोह-ममता से ऊपर उठ गए। वह ध्यान में ऐसे लगे रहते कि अपने आपको वे भूल जाते। विचरते हुए मृग वहां आ जाते। उनके शरीर से सींग रगड़ने लगते। किन्तु वत्स मुनि को उसका भनक नहीं हो पाता। वहां के वनवासी यह दृश्य देखते। आश्चर्य करने लगते। वे उन्हें मृगश्रृंग कहकर पुकारने लगे।

वत्स मुनि को तपस्या करते-करते बरसों बीत गए। एक दिन भगवान विष्णु प्रकट हुए। मृगश्रृंग तो ध्यान में समाधि लगाए हुए थे। उन्हें कुछ भी पता नहीं चला। यह देखकर विष्णु ने उनके माथे को छुआ। मुनि की चेतना जैसे लौट आई। भगवान विष्णु बोले-‘‘ वत्स, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहो, वर मांग लो।’’

मुनि मृगश्रृंग के शरीर में रोमांच हो आया। नेत्रों से खुशी के आंसू झरने लगे। उन्होंने बार-बार भगवान को नमन किया। भगवान ने फिर कहा-‘मृगश्रृंग, तुमने ब्रह्मचर्य का पालन किया है। बिना किसी लोभ के तुमने मेरी तपस्या की है। अब तुम गृहस्थ धर्म का पालन करो। माता-पिता की सेवा करो।

मृगश्रृंग ने भगवान के चरणों में मस्तक रख दिया। बोले-‘‘आपके दर्शन पाकर मैं धन्य हुआ। मैं आपके आदेश का पालन अवश्य करूंगा।’’

भगवान विष्णु अंतध्र्यान हो गए। मुनि मृगश्रृंग अपने घर, माता-पिता के पास पहुँचे। माता-पिता को उन्होंने भगवान के दर्शन होने की बात बताई। यह सुनकर वे दोनों फूले नहीं समाए। उन्होंने पुत्र को आशीर्वाद दिया और बोले-‘‘तुम्हारा जन्म धन्य हुआ। बड़े-बड़े त्यागी- तपस्वी भी उनके दर्शन को तरसते हैं, पर वह तुम्हें सहज ही प्राप्त हो गया। अब तुम वैसा करो, जैसा भगवान विष्णु ने कहा है।’’

कुत्स मुनि अपने पुत्र के लिए सही कन्या ढूंढने लगे। भोजपुर में उचथ्य मुनि की एक कन्या थी। उसका नाम था सुव्रता। वह गुणवान और सुंदर थी। धर्म-कर्म में बहुत रूचि रखती थी। नित्य कावेरी में स्नान करती। संध्या भजन करती। कुत्स मुनि ने उसे देखा, तो अपने पुत्र के लिए उचित समझा। उन्होंने सुव्रता का हाथ अपने पुत्र के लिए मांगा। कुत्स मुनि की बात सुन, सुव्रता के पिता उचथ्य मुनि को बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने सुव्रता की सहमति लेकर हाँ कर दी।

एक दिन सुव्रता अपनी सखियों के साथ कावेरी नदी में स्नान करने जा रही थी कि अचानक एक जंगली हाथी नदी से बाहर आया। सूंड उठाकर वह उन कन्याओं की ओर झपटा। वे चिल्लाती हुई, भाग खड़ी हुई। भागते-भागते चारों लड़कियाँ एक बडे़ कुएं में जा गिरीं। कुएं में जल नहीं था। वह झाड़-झंखाड़ से ढका था। उन लड़कियों को इतना सदमा लगा कि अचेत हो गई।

कुछ समय बाद, उनके कन्याओ के माता-पिता खोजते हुए वहाँ आए। किसी तरह उन्होंने कन्याओं को बाहर निकाला। कन्याओं को निर्जीव पाकर रोने-कलपने लगे। तभी मुनि मृगश्रृंग वहाँ आए। उन्होंने ढांढस बंधाते हुए कहा-‘‘मैं इन कन्याओं को जीवित कर दूँगा। आप धैर्य रखें।’’

मुनि मृगश्रृंग कावेरी के जल में खड़े हो गए। वह सूर्य की ओर मुख करके, भुजाओं को उठाकर स्तुति करने लगे। कुछ ही देर में वह भयंकर हाथी जल से निकला। चिंघाड़ता हुआ मुनि की ओर झपटा। किन्तु मुनि एकदम शांत भाव से स्तुति करते रहे। मुनि के निकट आने पर हाथी शांत हो गया। लगा, जैसे मुनि को प्रणाम कर रहा हो। हाथी ने सूंड से पकड़कर मुनि को अपनी पीठ पर बैठा लिया।

मुनि ने हाथ में जल लिया। संकल्प करते हुए कहा-‘‘मैं अपना आधा पुण्य तुझे देता हूँ।’’,

जैसे कोई चमत्कार हुआ। हाथी प्रसन्नता से खिल उठा। मुनि ने हाथी के मस्तक पर धीरे-धीरे हाथ फेरा। तभी क्या देखते हैं कि उस जीव ने हाथी का शरीर त्याग दिया। वह देवता के रूप में प्रकट हो गया। उसने मुनि की स्तुति की और बारम्बार धन्यवाद दिया। उसने बताया कि शाप के कारण उसे पशु की योनि में आना था। अब वह स्वर्ग को जा रहा है।

मुनि मृगश्रृंग फिर से सूर्य की ओर मुख करके स्तुति करने लगे। यमराज प्रकट हुए। उन्होंने मुनि से कहा कि वर मांग लो। मुनि ने हाथ जोड़कर यमराज को प्रणाम किया। उनसे प्रार्थना की कि आप इन चारों कन्याओं को जीवित करने की कृपा कीजिए।

यमराज ने ‘तथास्तु’ कहा। फिर वह अंतध्र्यान हो गए।

कन्याओं की चेतना पूरी तरह लौट आई। उन्हें लग रहा था, जैसे वे सोकर उठी हैं। उन्होंने यमलोक का आँखों देखा हाल अपनी माताओं को सुनाया। कुछ दिन बाद सुव्रता का विवाह मुनि मृगश्रृंग से हो गया। उसी वेदी पर उसकी तीन सखियों के विवाह भी किए गए। वे भी अपनी-अपनी ससुराल जाकर, सुख से रहने लगी।

मृगश्रृंग और सुव्रता ने लम्बी आयु पाई।


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